आधार से हर पहचान जुड़ी, पर वोटर आईडी क्यों नहीं? पारदर्शिता पर उठ रहे गंभीर सवाल
आधार से हर पहचान जुड़ी, पर वोटर आईडी क्यों नहीं? पारदर्शिता पर उठ रहे गंभीर सवाल

संवाददाता फरियाद अली,
देश में आधार कार्ड को हर आवश्यक दस्तावेज़ और सुविधा से अनिवार्य रूप से जोड़ा जा चुका है। पैन कार्ड, राशन कार्ड, बैंक खाता, मोबाइल नंबर, गैस कनेक्शन, स्कूल परीक्षाएँ, सरकारी योजनाएँ—लगभग हर सरकारी प्रक्रिया के लिए आधार लिंकिंग अनिवार्य है। यहाँ तक कि कोविड-19 वैक्सीनेशन के दौरान भी पहचान सत्यापन के लिए आधार की अनिवार्यता दिखाई दी।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार—मतदान—के लिए आधार लिंकिंग अब तक अनिवार्य क्यों नहीं की गई?
इसी सवाल को लेकर नागरिकों के बीच असंतोष बढ़ रहा है। चुनाव आयोग आधार-वोटर आईडी लिंकिंग की बात तो करता है, पर इसे पूर्ण अनिवार्य नहीं किया गया। ऐसे में कई गंभीर शंकाएँ उठ रही हैं—
1. डुप्लिकेट वोटिंग का खतरा
जानकारों के अनुसार, यदि आधार को वोटर आईडी से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए तो—
एक ही व्यक्ति के डबल/ट्रिपल नाम हट जाएंगे।
फर्जी वोटर पहचान खत्म हो जाएगी।
अलग-अलग नामों से पंजीकृत मतदाता स्वतः बाहर हो जाएंगे
ठीक उसी तरह, जैसे राशन कार्ड लिंकिंग के बाद लाखों फर्जी नाम हटाए गए।
2. सरकार ने बाकी जगहों पर पाबंदियाँ क्यों?
पैन कार्ड न जोड़ने पर ₹10,000 तक का जुर्माना।
सरकारी योजनाओं का लाभ बिना आधार के असंभव।
गैस, बैंक खाता, शिक्षा, नौकरी—हर जगह आधार जरूरी।
तो फिर सिर्फ मतदान के लिए आधार अनिवार्य क्यों नहीं?
3. लोकतंत्र की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न
लॉकडाउन में वैक्सीन को आधार से जोड़ने का काम रिकॉर्ड गति से हुआ।
पर जब बात मतदाता सूची की आती है, तो प्रक्रियाएँ धीमी क्यों पड़ जाती हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधार लिंकिंग लागू हो जाए तो चुनाव प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी बन सकती है। इससे फर्जी मतदान पर रोक लगेगी और मतदाता सूची अधिक सटीक होगी।
राजनीतिक दृष्टिकोण से हटकर यह एक गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है।
देश के नागरिकों को इस विषय पर जागरूक होना होगा,
नोट: यह रिपोर्ट किसी राजनीतिक दल, विचारधारा या समूह के पक्ष या विरोध में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल चुनावी पारदर्शिता पर उठ रहे सवालों को सीधे और निष्पक्ष रूप में जनता तक पहुँचाना है।
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