अतिक्रमण पर कार्रवाई होना निश्चित रूप से आवश्यक था,
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चार-चार मंजिला अवैध झोपड़पट्टियां खड़ी हो रही थीं, तब प्रशासनिक अधिकारी आखिर कहाँ थे? क्या उनकी आंखों के सामने यह सब नहीं हो रहा था? अगर हुआ, तो फिर उन अधिकारियों पर आज तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
गरीब इंसान मजबूरी में जहां जगह मिलती है वहां सिर छुपाने की कोशिश करता है, लेकिन असली खेल तो भूमाफिया, भ्रष्ट अधिकारी और राजनीतिक संरक्षण का होता है। बिना संरक्षण के हजारों अवैध निर्माण सालों तक खड़े ही नहीं रह सकते। आखिर किसके आशीर्वाद से यह अवैध साम्राज्य खड़ा हुआ?
आज कहा जा रहा है कि वांद्रे इलाके में बांग्लादेशी घुसपैठिए थे। अगर यह सच है, तो सवाल यह भी उठता है कि इतने वर्षों तक उन्हें किसने पनाह दी? किसने उनके दस्तावेज बनाए? किसने बिजली-पानी के कनेक्शन दिए? और किसके संरक्षण में यह पूरा नेटवर्क फलता-फूलता रहा?
आज बुलडोजर चल गया, हजारों गरीब सड़क पर आ गए, लेकिन जिन भूमाफियाओं ने करोड़ों कमाए, जिन अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं और जिन नेताओं ने वोट बैंक के लिए अवैध बस्तियों को बढ़ावा दिया, वे आज भी एसी बंगलों और आलीशान दफ्तरों में सुरक्षित बैठे हैं। यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है।
अगर सच में न्याय करना है, तो सबसे पहले उन भ्रष्ट अधिकारियों, भूमाफियाओं और राजनीतिक संरक्षकों को बेघर करो जिन्होंने अवैध अतिक्रमण को जन्म दिया। उसके बाद गरीबों पर बुलडोजर चलाने की बात करो। क्योंकि गरीब सब समझता है — कौन उसे बसाता है, कौन इस्तेमाल करता है और वक्त आने पर कौन उसे सड़क पर छोड़ देता है।

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