इंतकाल की खबर सुनकर गहरा अफ़सोस — समाजसेवा के स्तंभ, रहनुमा-ए-कौम क़ासिम रज़ा साहब को ख़िराज-ए-अक़ीदत
इंतकाल की खबर सुनकर गहरा अफ़सोस — समाजसेवा के स्तंभ, रहनुमा-ए-कौम क़ासिम रज़ा साहब को ख़िराज-ए-अक़ीदत

मुंबई /कुर्ला – मरहूम क़ासिम रज़ा साहब सिर्फ़ एक तालीमी शख्सियत नहीं, बल्कि इंसानियत, इल्म और खिदमत का उज्ज्वल प्रतीक थे।
उन्होंने अपनी ज़िंदगी समाज के पिछड़े तबकों की बेहतरी, उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी और नौजवान पीढ़ी की रहनुमाई में गुज़ार दी।
उन्होंने हर उस काम को अंजाम दिया जो समाज में मोहब्बत, एकता और अमन का पैग़ाम लेकर आता था।
विदर्भ वेलफेयर एसोसिएशन (VWA) के संस्थापक और रूह-ए-रवाँ के रूप में उन्होंने शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और इंसानियत की बुनियाद को मज़बूत किया।
उनकी कोशिशों से सैकड़ों ग़रीब बच्चों ने अपनी तालीम मुकम्मल की और समाज में अपनी पहचान बनाई।
क़ासिम रज़ा साहब का कहना था, “इल्म ही असली दौलत है, और इंसानियत इसका सबसे खूबसूरत चेहरा।”
उन्होंने हमेशा नौजवानों को आगे बढ़ने, पढ़ने और समाज की सेवा में लगने की नसीहत दी।
उनकी ज़िंदगी सादगी, अख़लाक़ और ईमानदारी का आईना थी।
उन्होंने जो काम छोड़े हैं, वो आने वाली नस्लों के लिए रहनुमा साबित होंगे।
क़ासिम रज़ा साहब ने तालीम, राहत और इंसाफ़ के क्षेत्र में जो नक़्श छोड़े हैं, उन्हें मिटाना नामुमकिन है।
उनका जाना समाज, तालीम और इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ी कमी है।
उनकी यादें हमेशा दुआओं के साथ ज़िंदा रहेंगी —
क्योंकि ऐसे लोग फ़ना नहीं होते, बल्कि लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
إِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दरजात बुलंद करे,
उनकी क़ब्र को जन्नत का बाग़ बनाए,
और उनके अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।
आमीन या रब्ब-उल-आलमीन।
जफर सिद्दीकी
एडिटर “दैनिक बुलंद दुनिया”
विदर्भ वेलफेयर एसोसिएशन मुंबई मीडिया इंचार्ज
ने मरहूम के इंतकाल पर गहरा अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा —
“क़ासिम रज़ा साहब का इंतकाल सुनकर दिल ग़म से भर गया।
वो सिर्फ़ एक अज़ीज़ दोस्त नहीं, बल्कि एक ऐसे रहनुमा थे जिन्होंने समाज को नई सोच, नई दिशा और नई तालीम दी।
उनकी शख्सियत सादगी, सच्चाई और खिदमत का शानदार संगम थी।
उन्होंने हमेशा इंसान को इंसान से जोड़ने का सबक़ दिया और एकता व मोहब्बत की जो मिसाल कायम की, वो हमेशा याद रखी जाएगी।
उनका दिल ग़रीबों के लिए धड़कता था और ज़ुबान हमेशा इल्म व अमन की बात करती थी।
उन्होंने हर मौके पर समाज की बेहतरी को तरजीह दी और तालीम को अपना मिशन बनाया।
आज उनका जाना हमारे लिए एक बड़ी तालीमी, सामाजिक और इंसानी कमी है।
उनकी मुस्कुराहट, उनका अख़लाक़ और उनकी रहनुमाई हमेशा यादों में ज़िंदा रहेगी।
मैं अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम अता करे,
और उनके घरवालों, रिश्तेदारों और चाहने वालों को सब्र-ए-जमील दे।
क़ासिम रज़ा साहब की तालीम, उनकी फिक्र और उनका मिशन हमारी रहनुमाई करता रहेगा —
यही उनके लिए सबसे बड़ा ख़िराज-ए-अक़ीदत होगा।”
Share this story