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मंत्री आशिष शेलार ने दी शुभकामनाएँ, कहा- “बनारस आकर फेस्टिवल में शामिल होऊँगा”

• Tue Sep 16 2025 FAC News Desk

मंत्री आशिष शेलार ने दी शुभकामनाएँ, कहा- “बनारस आकर फेस्टिवल में शामिल होऊँगा”

संवाददाता शोएब म्यानुंर मुंबई

 

मुंबई, शनिवार (13 सितम्बर 2025)।

ऐतिहासिक फिरोज़शाह मेहता सभागार में शनिवार को आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य और संस्कृति का ऐसा संगम बन गया, जिसने मुंबई की बरसात भरी शाम को यादगार बना दिया। नव भारत निर्माण समिति और मुंबई विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस आयोजन ने यह साबित किया कि साहित्य और कला की चर्चा आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पहले थी। लगातार हो रही बारिश के बावजूद सभागार में जगह-जगह खड़े होकर लोग कार्यक्रम सुनते रहे।

 

शुरुआत महाराष्ट्र सरकार के आईटी एवं संस्कृति मंत्री आशिष शेलार के आगमन से हुई। उन्होंने मंच से कहा कि बनारस की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा पूरे विश्व के लिए प्रेरणा है और इस तरह के आयोजनों से यह संदेश और दूर तक पहुँचता है। उन्होंने वादा किया कि आने वाले सत्रों में वे स्वयं बनारस जाकर इस उत्सव का हिस्सा बनेंगे। उनके इस वक्तव्य ने आयोजन की गंभीरता और महत्व को और बढ़ा दिया।

 

मंच पर इसके बाद साहित्य और समाज के रिश्ते पर विमर्श हुआ। लेखिका मंजू लोढ़ा और गीता सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य केवल पढ़ने-सुनने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह समाज की आत्मा को समझने का माध्यम है। महिला लेखन की बढ़ती उपस्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह समय महिलाओं के अनुभवों और दृष्टिकोण को मुख्यधारा में लाने का है। उनकी बातें श्रोताओं ने ध्यान से सुनीं और कई युवा छात्राओं ने इस पर सवाल भी किए।

 

दोपहर का एक अहम हिस्सा राही मासूम रज़ा की जन्मशती पर आयोजित परिचर्चा रहा। हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कथाकार और पूर्व पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय तथा विद्वान डॉ. रविन्द्र कात्यान ने रज़ा के लेखन पर अपने विचार साझा किए। संचालन आसिफ़ आज़मी ने किया। वक्ताओं ने कहा कि “आधा गाँव” और “नीम का पेड़” जैसे उपन्यास केवल कथाएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज की बनावट और टूटन को समझने का दस्तावेज़ भी हैं। रज़ा के लेखन में गाँव, जाति, भाषा और राजनीति की परतें इतनी बारीकी से आती हैं कि उन्हें पढ़े बिना उत्तर भारत के सामाजिक इतिहास को समझना अधूरा है।

 

शाम होते-होते माहौल कविताओं और ग़ज़लों से और रंगीन हो गया। गोरखपुर की युवा कवयित्री आकृति विज्ञा अर्पण ने पूरे सत्र का संचालन किया और वरिष्ठ शायर दीक्षित दनकौरी उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। मंच पर मदन मोहन दानिश, असलम हसन, श्लेष गौतम, संतोष सिंह, दानबहादुर सिंह और अभिषेक तिवारी जैसे कवियों ने अपनी-अपनी कविताएँ और ग़ज़लें सुनाईं। आकृति की कविता “सुनो बसंती हील उतारो” ने दर्शकों को गहरी संवेदनाओं से जोड़ा, जबकि दनकौरी की ग़ज़ल “मिट्टी” ने समकालीन समाज के सवालों को सहज भाषा में सामने रखा।

 

इसी सत्र के दौरान युवा कवि संतोष सिंह के कविता संग्रह “तो क्या होगा” का लोकार्पण भी हुआ। लोकार्पण के अवसर पर साहित्यकार आलोक श्रीवास्तव और आलोचक ओबेद आज़म आज़मी ने कहा कि साहित्य का अर्थ केवल कलात्मकता नहीं है, बल्कि यह समाज में संवाद और चेतना पैदा करने की जिम्मेदारी भी निभाता है।

 

कार्यक्रम में नव भारत निर्माण समिति के सचिव और बनारस लिट फेस्ट के संस्थापक बृजेश सिंह का संबोधन भी विशेष रहा। उन्होंने कहा कि काशी का अध्यात्म और सांस्कृतिक संदेश तथा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा का संगम बहुत प्राचीन है। यह केवल दो प्रदेशों का मेल नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई और बनारस जैसे शहरों को जोड़ने वाले इस तरह के आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते खोलते हैं।

 

रात का अंतिम सत्र संगीत और स्वर को समर्पित था। बनारस से आए कलाकार सतीश मिश्रा और संजय सिंह ने अपनी गायकी से पूरे माहौल को आत्मीय बना दिया। उनकी आवाज़ में बनारस की ठाठ और ठुमरी का स्वाद भी था और शास्त्रीय परंपरा की गहराई भी। श्रोताओं ने देर तक तालियाँ बजाईं और कई लोग बार-बार उनसे दोहराने की गुज़ारिश करते रहे। इसके साथ ही संगीतकार दिलीप सेन, सुप्रसिद्ध गायिका दीपा नारायण और नृत्यांगना सोमंका भट्टाचार्य की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को प्रभावित किया। दीपा नारायण की मधुर आवाज़ और सोमंका की नृत्य प्रस्तुति ने कार्यक्रम को और रंगीन बना दिया।

 

यह पूरा आयोजन केवल साहित्यिक अभिरुचि का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संगम था जिसमें कविता, ग़ज़ल, संगीत और विमर्श—सभी का स्थान बराबर था। श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने यह स्पष्ट किया कि मुंबई जैसे महानगर में भी साहित्य और संस्कृति के लिए लोगों की भूख उतनी ही गहरी है जितनी छोटे शहरों और कस्बों में।

 

बनारस लिटरेचर फेस्टिवल का यह मुंबई सत्र इस संदेश के साथ समाप्त हुआ कि साहित्य, कला और संस्कृति की धारा कहीं भी जाए, वह लोगों को जोड़ने का कार्य करती है। मंत्री अशोक शेलार का यह आश्वासन कि वे अगले वर्ष बनारस आकर इस उत्सव में भाग लेंगे, आयोजन की गरिमा को और बढ़ा गया। आयोजकों का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रम आने वाले समय में देश के विभिन्न हिस्सों को और निकट लाने में सहायक होंगे।

 

मुंबई की इस शाम ने यह दिखाया कि बनारस लिटरेचर फेस्टिवल अब केवल

बनारस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के अलग-अलग हिस्सों में संवाद और सहभागिता का सेतु बनने की ओर अग्रसर है।

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