स्मार्ट प्री-पेड मीटर पर बड़ा खुलासा:
“अनिवार्य नहीं” का दावा, जमीनी हकीकत में धड़ाधड़ इंस्टॉलेशन!
देश में स्मार्ट प्री-पेड मीटर को लेकर बड़ा विरोधाभास सामने आया है, लोकसभा में मंत्री ने साफ कहा कि प्री-पेड मीटर लगाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ राज्यों में तेजी से इन मीटरों का विस्तार किया जा रहा है जिससे आम उपभोक्ताओं में भारी असंतोष और भ्रम की स्थिति बन गई है, आंकड़ों के मुताबिक देशभर में अब तक 6.13 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं जिनमें करीब 2.25 करोड़ प्री-पेड मीटर शामिल हैं, सबसे ज्यादा मीटर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और गुजरात में लगाए गए हैं, सरकार का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया उपभोक्ताओं की सहमति और पारदर्शिता के लिए है लेकिन जमीनी स्तर पर कई जगहों से जबरन मीटर बदलने, रिचार्ज खत्म होते ही बिजली काटने और बिलिंग में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आ रही हैं, उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिना स्पष्ट जानकारी और अनुमति के पुराने मीटर हटाकर प्री-पेड मीटर लगाए जा रहे हैं जिससे खासकर गरीब और ग्रामीण जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है, उधर सूत्रों का कहना है कि बिजली कंपनियों के घाटे को कम करने के लिए यह पूरी योजना तेजी से लागू की जा रही है और इसे राजस्व बढ़ाने का बड़ा जरिया माना जा रहा है, ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि जब यह व्यवस्था अनिवार्य नहीं है तो फिर पूरे देश में इसे इतनी तेजी से क्यों लागू किया जा रहा है और क्या वास्तव में उपभोक्ताओं की सहमति ली जा रही है या सिर्फ कागजों में प्रक्रिया पूरी की जा रही है, स्मार्ट मीटर को लेकर अब राजनीति भी गरमा गई है और विपक्ष इसे जनता पर आर्थिक बोझ बता रहा है जबकि सरकार इसे सुधार और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, फिलहाल सच्चाई यही है कि नीति और जमीन के बीच का अंतर साफ नजर आ रहा है और आने वाले समय में यह मुद्दा और ज्यादा बड़ा विवाद बन सकता है।

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